हिंदी न्यूज़ – mothers day 2018 best urdu shayri for mothers day/Mother’s Day Special: ‘घर लौट के रोएंगे मां बाप अकेले में, मिट्टी के खिलौने भी सस्ते न थे मेले में’

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आज मदर्स डे है. मदर्स डे हम हर साल मई महीने के दूसरे रविवार को मनाते हैं. इस दिन इतिहास क्या है. जानिए कब, कैसे, किस देश से मदर्स डे की शुरुआत हुई. मदर्स डे मनाने का रिवाज पुराने ग्रीस से आरंभ हुआ. ग्रीस के देवताओं की मां स्य्बेले के सम्मान में मदर्स डे मनाया जाता था. यह दिन त्योहार की तरह मनाया जाता था.

एशिया माइनर के आसपास और रोम में भी वसंत के आस-पास 15 मार्च से 18 मार्च तक मदर्स डे मनाया जाता था. मां के सम्मान में यूरोप और ब्रिटेन में भी कई प्रथाएं प्रचलित थीं. इन प्रथाओं में किसी खास संडे को मातृत्व का उत्सव मनाया जाता था. इस संडे को मदरिंग संडे का नाम दिया गया था. इस दिन परिवार के सदस्य मां को उपहार देते थे और उस दिन मां से घर का कोई काम नहीं करवाया जाता था.

कई देशों में मदर्स डे वहां के प्रचलित धर्मों की देवी या किसी महान औरत की पुण्यतिथि के दिन भी मनाया जाता रहा है. जैसे कैथलिक देशों में वर्जिन मैरी डे और थाईलैंड में थाइलैंड की रानी के जन्मदिन की तारीखों से मदर्स डे की तारीखों को बदल दिया गया. अमेरिका में सबसे पहला मदर्स डे जूलिया वॉर्ड होवे ने मनाया था. 1912 में मदर्स डे इंटरनेशनल एसोसिएशन बना. एना जॉर्विस ने मई के दूसरे रविवार को मदर्स डे के रूप में घोषित कर दिया.

मां से मोहब्बत के पाक जज़्बे को ग़ज़लों, शायरी में भी बयां किया गया है. मां के प्यार को जिन शायरों ने अशआर में लिखा, पेश हैं उनमें से कुछ अंश .आज फिर माँ मुझे मारेगी बहुत रोने पर
आज फिर गाँव में आया है खिलौने वाला
अज्ञात

अभी ज़िंदा है माँ मेरी मुझे कुछ भी नहीं होगा
मैं घर से जब निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है
मुनव्वर राना

ऐ रात मुझे माँ की तरह गोद में ले ले
दिन भर की मशक़्क़त से बदन टूट रहा है
तनवीर सिप्रा

चलती फिरती हुई आँखों से अज़ाँ देखी है
मैं ने जन्नत तो नहीं देखी है माँ देखी है
मुनव्वर राना

एक लड़का शहर की रौनक़ में सब कुछ भूल जाए
एक बुढ़िया रोज़ चौखट पर दिया रौशन करे
इरफ़ान सिद्दीक़ी

एक मुद्दत से मिरी माँ नहीं सोई ‘ताबिश’
मैं ने इक बार कहा था मुझे डर लगता है
अब्बास ताबिश

घर लौट के रोएँगे माँ बाप अकेले में
मिट्टी के खिलौने भी सस्ते न थे मेले में
क़ैसर-उल जाफ़री

घर से निकले हुए बेटों का मुक़द्दर मालूम
माँ के क़दमों में भी जन्नत नहीं मिलने वाली
इफ़्तिख़ार आरिफ़

इस लिए चल न सका कोई भी ख़ंजर मुझ पर
मेरी शह-रग पे मिरी माँ की दुआ रक्खी थी
नज़ीर बाक़री

इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है
मुनव्वर राना

जब भी कश्ती मिरी सैलाब में आ जाती है
माँ दुआ करती हुई ख़्वाब में आ जाती है
मुनव्वर राना

कल अपने-आप को देखा था माँ की आँखों में
ये आईना हमें बूढ़ा नहीं बताता है
मुनव्वर राना

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