हिंदी न्यूज़ – #HumanStory: सलाम! दुधमुंहे बच्चे के पिता की बचाई जान, पुलिसवाले ने अपने सीने पर खाई गोली/ This policeman takes bullet to save his junior

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दक्षिणी दिल्ली में शनिवार को कुख्यात गैंगस्टर के साथ पुलिस की स्‍पेशल सेल की मुठभेड़ हुई. इस दौरान हेड कॉन्सटेबल गुरदीप सिंह को निशाना बनाकर फायरिंग हुई, तभी बिजेंद्र सिंह देशवाल तेजी से गुरदीप के सामने आ गए. गोली बिजेंद्र के सीने पर लगी. वे अस्पताल में हैं और अब खतरे से बाहर हैं.

सब-इंस्पेक्टर बिजेंद्र के लिए ये पहला मौका नहीं. उनके बेटे आशीष का कहना है कि 33 सालों के करियर में अक्सर ऐसे मौके आते रहे हैं.

शनिवार की सुबह से पापा का फोन बंद जा रहा था. ये हमारे लिए कोई नई बात नहीं थी. पापा किसी मिशन पर जाते हैं तो फोन बंद रहता है. हम अपने कामों में जुटे रहे. दोपहर के आसपास मां के पास फोन आया. ‘पापा अस्पताल में हैं और बुरी तरह से घायल हैं.’ मैं तुरंत निकल गया. पहुंचा तो पसीने में तरबतर था. अस्पताल के कॉरीडोर से ही जाने-पहचाने चेहरे दिखने लगे. सारे वर्दीवाले थे. परिवार से पहले वे हाजिर हो चुके थे. पापा के पास पहुंचते-पहुंचते मैं लगभग रुआंसा हो चुका था. पापा के शब्द थे- बेटा, परेशान मत हो, ये प्राइड मूमेंट है.

दिल्ली में मुठभेड़ः मारे गए 4 बदमाशों में वांटेड राजेश भारती भी शामिल, 6 पुलिसकर्मी घायलबगल के ही बिस्तर पर घायल हेड कॉन्सटेबल भी लेटे हुए थे, जिनकी जान बचाने के लिए पापा सामने आ गए थे. गुरदीप उम्र में मुझसे भी 2 साल छोटे हैं, वे हाल ही में पिता बने हैं. उनसे मिलते ही मैं समझ गया कि क्यों पापा ने अपनी जान की परवाह किए बगैर उनकी जान बचाई. ये एक पिता का दूसरे पिता के लिए दर्द था. एक बेटे के बतौर मैं पापा की सेहत के लिए जितना फिक्रमंद था, एक इंसान बतौर उतना ही गर्वित.

कैसा होता है एक पुलिसवाले का बेटा होना!

पुलिसवाले के बच्चे स्कूल में अलग से पहचाने जा सकते हैं, खासकर किसी फंक्शन या पेरेंट-टीचर मीट (पीटीएम) में. मुझे याद नहीं आता कि पापा कभी पीटीएम में आए हों. बहन के स्कूल में भी कमोबेश यही हाल रहा. यहां तक कि हमें कभी उनसे शिकायत करने या दूसरे बच्चों की तरह जिद पर अड़ने का भी वक्त नहीं मिला. धीरे-धीरे हम खुद ही समझने लगे. पापा का रुटीन देखते. वो कब आते हैं, कब जाते हैं, मुश्किल से पता चलता. कुछ निहायत जरूरी हो तो फोन पर बात कर लेते.

हम बच्चे होकर भी ये समझने लगे थे कि पापा से ‘गैरजरूरी’ बातें नहीं करनी हैं. अब बच्चों के लिए भला जरूरी क्या होगा तो अक्सर हमारी बातचीत नहीं के बराबर होती. 

बिजेंद्र ने 33 साल पहले दिल्ली पुलिस में कॉन्सटेबल बतौर शुरुआत की थी. वहां से नारकोटिक्स और फिर स्पेशल सेल में पहुंचे. कॉन्सटेबल से सब-इंस्पेक्टर तक के सफर में कई उतार-चढ़ाव आए. इन सारी बातों का असर निजी जिंदगी पर भी पड़ा. आशीष याद करते हैं, पुलिसवालों के घर पर उनकी नौकरी डिस्कस नहीं होती है. वे परिवार के साथ एक टेबल पर खाते हुए सुख-दुख नहीं बांटते. छोटे थे तो दोस्तों की तरह हम भी त्यौहार पर पापा का साथ चाहते. लेकिन होली हो या फिर दिवाली, पापा किसी त्यौहार में घर पर नहीं रहे. गर्मी की छुट्टियां घर पर ही बीततीं. पापा के साथ कहीं जाने का मौका ही नहीं जुटता था. आखिरी बार 2013 में हमने साथ वक्त बिताया.

और आखिरी बार गले कब मिले? 

आशीष कहते हैं, ‘दादी के गुजरने पर’. तब हमारी भूमिकाएं बदल गई थीं. पापा के चेहरे पर किसी खोए बच्चे की तरह भाव थे और मैंने कसकर उन्हें गले लगा लिया था. यही शायद पहली बार भी था. एक और बार मैंने पापा के चेहरे पर अपने बेटे से लाड़ जताने वाले भाव देखे. हुआ यूं कि अपनी बहादुरी के लिए डिपार्टमेंट की तरफ से उन्हें कई सर्टिफिकेट मिले. मैंने उन्हें फ्रेम करा दिया था. तब भी पापा देर तक मुझे देखते रहे. कुछ कहा नहीं.

अस्पताल में गुरदीप सिंह से मुलाकात हुई. उसके पूरे परिवार से भी मिला. वे सभी ऐसे मिले मानो गुरदीप की जान बचाने में मेरी भी कोई भूमिका रही हो. ये पापा की ही इमेज है जो उनके साथी हमारे परिवार को भी अपने परिवार की तरह देखते हैं. मेरे अस्पताल पहुंचने से पहले ही वहां लगभग 40 पुलिसवाले पहुंच चुके थे. पापा के पल-पल की अपडेट उतनी ही तत्परता और बेचैनी से ले रहे थे. ये सब देखकर सहज ही अंदाजा लग सकता है कि क्यों पापा ने अपनी जान की बाजी लगाकर अपने साथी की जान बचाई.

पुलिसवाले की औलाद होना भी एक तरह से पुलिसवाला होना ही है. संवेदनाएं छिपाकर चेहरा सपाट रखना होता है, आशीष बहुत संभलते हुए कहते हैं.

हंसते हुए जोड़ते हैं- कम बोलने की आदत भी मुझे पापा से विरासत में मिली, तमाम दूसरी आदतों की तरह.

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