हिंदी न्यूज़ – human story of a surrogate mother in India

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इसी महीने की 20 को नन्हे के 6 महीने पूरे हो जाएंगे, सातवां लगेगा. उंगलियों पर तारीखें और घंटे याद रखती और लगातार मुस्कुराती मीना (नाम परिवर्तित) दूसरी बार सरोगेट मदर बनी हैं. गरीबी और लाचारी की वजह से कोख किराए पर तो दे दी लेकिन मॉडर्न साइंस और दुनियादारी मां को बच्चे से जुड़ने से रोक नहीं पाती. पढ़ें, मीना को…

पहला सप्ताह
उससे पहले मैं कभी प्राइवेट अस्पताल नहीं गई थी. आपके पैरों के निशान फर्श पर पड़ें, इससे पहले तो पोंछा लग जाता है. सरकारी अस्पताल की झरती पलस्तर और पान की पीक की जगह यहां चमचमाती दीवारें और मां-बच्चे के पोस्टर हैं. मुझे डॉक्टर के पास ले जाया गया. टेबल पर लेटी. जनानी डॉक्टर थी लेकिन मैं डर से कांप रही थी. इंजेक्शन भीतर जाता है. मैं नौ महीने बाद मिलने वाले पैसों के इस्तेमाल के बारे में सोच रही हूं.

दूसरा सप्ताहमुझे प्रेगनेंसी रिजल्ट का इंतजार करने को कहा गया. 15 साल की उम्र में शादी और तुरंत बाद मां बन गई. महीना नहीं आया, तब पता चला. तब भी घरवाले भागकर डॉक्टर के पास नहीं ले गए. यहां शुरुआत ही डॉक्टर से हुई. क्लाइंट का उदास चेहरा याद करती, जो पता नहीं कितनी मेहनत और कितनी नाकामयाबी के बाद मुझतक पहुंची. मैंने तुरंत आले पर अगरबत्ती जलाई. इस बार मैं पेट से होने के लिए उतावली थी.

तीसरा सप्ताह
रिजल्ट पॉजिटिव आए. मैं जितनी खुश थी, उतनी ही हैरान भी. पहली ही बार की कोशिश में मैं मां बनने जा रही थी. अब मैं अपनी झुग्गी छोड़कर ‘सरोगेट होम’ में थी. क्लाइंट कोई भी खतरा मोल नहीं ले सकते थे और न ही मुझपर पैसे लगाने वाली एजेंसी. सरोगेसी होम में मुझे नौ महीने रहना था, उन दो बच्चों को छोड़कर जिनकी मैं पहले से मां थी. पति ने उनकी देखभाल का वादा किया और हर हफ्ते मिलाने का.

दूसरा महीना
पहली बार पेट से थी तो गांव में थी. दिनभर घर के काम करती, खेत जाती. उल्टियों को आने की मोहलत नहीं मिलती थी. यहां कोई काम नहीं था. इंजेक्शनों के जरिए मां बनने जा रही थी. दिनभर उल्टियां करती. सिरदर्द रहता. लेकिन जो कहा जाता, खाना पड़ता था. यहां कोई तकलीफ नहीं थी और न ही कोई नखरे उठाने वाला था. मां नहीं थी, जो पूछे क्या खाने को जी चाहता है.

तीसरा महीना
पति दोनों बच्चों को लेकर आया. वो वैसे तो ढेर सारे सवाल करते हैं लेकिन सप्ताह में एक बार मिल रही मां के सामने आते ही सारे सवाल भूल जाते. मैंने बताया कि मैं खूब खा रही हूं इसलिए थोड़े दिनों में खूब मोटी हो जाऊंगी. वे मान गए. कितनी मोटी? कद्दू जैसी? छोटे ने पूछा. इन्हीं बच्चों के सुंदर भविष्य के लिए मैं इनसे दूर हूं. नौ महीने के एक-एक दिन गिनती.

चौथा महीना
इस बार के अल्ट्रासाउंड में बच्चे दिखने लगे थे. जुड़वा. एक-दूसरे से सटकर सोते हुए. आंखें, नाक, उंगलियां सब बनने लगी थीं. दो नन्हे दिल धड़क रहे थे. मैंने सब देखा. सब सुना. तीसरा दिल भी जोरों से धड़कने लगा. मेरा. अब तक मैं पैसों के बारे में सोच रही थी. पहली बार बच्चों के बारे में सोचा. मेरे पेट में जुड़वा बच्चे पल रहे थे, जो मेरे नहीं थे.

पांचवा महीना
ये प्रेगनेंसी पहले दोनों बच्चों से अलग थी. मैं दिन तो गिनती लेकिन अपने घर लौटने के. इस बार मेरी मां मेरी गोदभराई नहीं करने वाली थी. कोई मेरी पसंद का खाना पकाकर मुझे न्यौतने नहीं जा रहा. कोई मुझे तोहफे में साड़ी के साथ बच्चे का झबला या खिलौना नहीं देगा. मैं किसी और के बच्चे को संभाल रही हूं. अब मुझे ये खुद को बार-बार याद दिलाना पड़ता.

छठवां महीना
बच्चे पेट में लात मारने लगे हैं. कई बार पूरे जोर से दोनों एक साथ लातें लगाते. सरोगेट होम में साथ रहने वाली दूसरी मांएं हंस पड़तीं. हमें नहीं पता था, इन बच्चों के मां-पिता क्या करते हैं. वो खिलाड़ी भी हो सकते हैं या फिर पहलवान. खाली वक्त था और सोचने के लिए बातें ही बातें. लेकिन हर रात सोते हुए मैं अपने पेट को सहलाती. दोनों बच्चे क्या कभी मुझे जान सकेंगे?

सातवां महीना
आज फिर क्लाइंट्स ने मुझसे फोन पर बात की. पूछा कि खाने-पीने की कोई दिक्कत तो नहीं है. मैं धीरे-धीरे सवालों के जवाब देती रही. कहीं कोई दिक्कत नहीं. आराम से खाती हूं. जैसे सोने को कहा है, सोती हूं. शाम को पास के पार्क में हम औरतें टहलने जाती हैं. घर पर काम, साफ-सफाई के लिए लोग हैं. नॉर्मल डिलीवरी हो, इसके लिए टहलना ही अकेला तरीका है यहां.

आठवां महीना
पेट के ऊपर से बच्चों की हलचल दिखती है तो एकदम से मोह लगने लगता है. बच्चा तो बच्चा ही है. फिर अपने दोनों बच्चे याद आते हैं और खुद को इनसे दूर कर लेती हूं. बातें करने लगती हूं. टीवी देखती हूं ताकि मन बहल जाए. मां को बुलाया है. उसे बताया कि इंजेक्शन से भी बच्चे होते हैं. पहले परेशान हुई, फिर मान लिया. अब देखभाल के लिए वो भी साथ रहेगी.

नौंवा महीना
जितना सोचा था, उससे कहीं ज्यादा मुश्किल रहा ये वक्त. बार-बार अल्ट्रासाउंड में हिल रहे जुड़वा बच्चे याद आते. सोचती, वे देखने में कैसे होंगे. अगर मुझसे मिल सकते तो क्या मुझे पहचानते. अंट-संट सवालों के बीच वक्त आ गया. सरोगेट होम की इंचार्ज साथ थी. नॉर्मल डिलीवरी हुई. एक लड़की और एक लड़का. होते ही दोनों को अलग कमरे में ले गए. इंचार्ज ने कहा, ‘एक बार सीने से लगा लोगी तो छोड़ नहीं सकोगी’.

घर वापसी
मैं अपने घर लौट आई. दवाएं चल रही थीं ताकि दूध आना रुके. पैसे मिल चुके थे. पति सेब काटकर देता. दोनों बच्चे इतने महीनों बाद मां को देखकर खुशी से किलकते. मैं फिर उन जुड़वा बच्चों को कभी नहीं देख सकी. एहतियात के तौर पर हमें कोई नंबर नहीं दिया जाता, न नाम-पता. हर साल अपनी डिलीवरी वाले रोज उनके लिए खीर पकाती और प्रार्थना करती हूं. वे जहां रहें, खुश रहें.

(इनपुट: राधा सरोगेट मदर केयर प्राइवेट लिमिटेड, दिल्ली)

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