हिंदी न्यूज़ – human story of a boy who works in a factory after his father’s death

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एक मजदूर बच्चे की आपबीती…

मैं उसी हथौड़ी-छेने से काम करता हूं जो अब्बू थामा करते थे. उन्हीं मशीनों के बीच काम करता हूं जो कभी अब्बू का खिलौना हुआ करती थीं. मेरे अब्बू बेहद मजबूत इंसान थे. आज भी कोई यकीन नहीं कर पाता है कि उनकी मौत गर्मी में झुलसने से हुई. खुद मैं भी नहीं.

रात में दर्द से नींद नहीं आती है. हाथ-पैर-कंधे सब दर्द करते रहते हैं. सुबह नींद लगती ही है कि फैक्टरी का सायरन सुनाई देने लगता है. मैं इसी फैक्टरी में काम करता हूं. मेरे आसपास के सारे मजदूर काम के लिए निकल रहे होते हैं. कोई-कोई मेरे घर का दरवाजा भी थपथपाता हुआ जाता है. एक-दो लोग हैं, जो मेरा इंतजार करते हैं. मैं उन्हें चचाजान कहता हूं. अम्मी रात का चावल डिब्बे में भरकर रख देती है, मैं वो उठाकर फैक्टरी के लिए निकल जाता हूं.

सालभर पहले दिन की शुरुआत एकदम अलग तरह से होती. रात में चाहे जल्दी सो जाऊं, सुबह देर तक सोता रहता. अम्मी आवाज दे-देकर हलाकान हो जाती. अब्बू सिर पर हाथ फेरकर फैक्टरी जा चुके होते. जब हांडी पकने की खुशबू आती, तब जाकर जागता. कुछ खाकर मोहल्ले के बच्चों के साथ खेलने में लग जाता, जब तक कि दोबारा भूख न लग आए. पढ़ाई भी करता लेकिन वो सिर्फ अब्बू की डांट से बचने के लिए.हम सारे बच्चों का सबसे पसंदीदा काम था पास की नदी में तैरना. पानी देखते ही मैं मछली हो जाता. नहाने के लिए दूसरे बच्चे जब तक तैयार होते, मैं कपड़े उतारकर नदी में छलांग लगा चुका होता. घंटों तैरता और तब तक तैरता रहता, जब तक आखिरी दोस्त भी जाने के लिए तैयार न हो जाए.

पिछले साल फैक्टरी में ही गर्मी लगने से अब्बू का इंतकाल हो गया. जब डॉक्टर ने मौत की वजह बताई तो हमें यकीन ही नहीं हुआ. अब्बू कद्दावर इंसान थे. चिलचिलाती धूप में, पत्थरों-मशीनों के बीच काम करने के आदी. वे भला गर्मी लगने से कैसे जा सकते हैं? बाद के कई महीनों तक भी मैं डॉक्टर की बताई वजह पर यकीन न कर सका. वजह जो भी हो लेकिन अब्बू का जाना एक सच था.

अब फैक्टरी में उनकी जगह मैं ले चुका हूं. अब्बू के इंतकाल के बाद फैक्टरी के लोग तसल्ली देने आए. तभी उन्होंने ये फैसला लिया कि उनकी जगह मैं काम करूंगा. किसी ने मुझसे नहीं पूछा कि मैं काम करना चाहता हूं. या फिर कर भी सकूंगा कि नहीं! अपनी तरफ से उन्होंने ये नेक फैसला ही लिया क्योंकि अब्बू के बाद हमारे पास खाने को कुछ नहीं था.

वैसे तो मैं 11 साल का हूं लेकिन अब्बू जितना ताकतवर अभी नहीं. मुझे उन्हीं के सामानों से वही काम करना होता है जो पहले अब्बू किया करते थे. थक जाता हूं. भूख लगती है. काम करते हुए नींद के झोंके आने लगते हैं. तब पास का कोई आवाज दे देता है. बड़ी-बड़ी मशीनों के बीच थोड़ी भी चूक जान ले सकती है. फैक्टरी में पहला सबक यही सिखाया गया.

अब्बू और नदी के अलावा जो चीज सबसे ज्यादा याद आती है, वो है आइसक्रीम. अब्बू गर्मियों में रोज मेरे लिए रंग-बिरंगी आइसक्रीम लाया करते. फैक्टरी में काम करते हुए जब गर्मी से झुलसने लगता हूं तो बार-बार आइसक्रीम खाने की इच्छा होती है. कई बार शाम को मेरे एक चाचा आइसक्रीम लेकर आते हैं. फैक्टरी के भारी काम में वही मेरी मदद भी करते हैं. चाचा कहते हैं कि हम सबको एक-दूसरे की जरूरत है. अकेला कोई भी पूरा नहीं.

मुझसे बेहतर इस बात को कौन समझेगा! मैं भी बड़ा होकर ‘आइसक्रीम-अंकल’ के जैसा बनना चाहता हूं. दूसरों के काम आने वाला और उन्हें खुशियां देने वाला.

(रॉनी की कहानी हमने फेसबुक पेज GMB Akash की इजाजत से ली है.)

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