हिंदी न्यूज़ – ये सीरियल कुछ सिखलाता है… शो जिसमें सास-बहू नहीं मुद्दों पर होती है बात Ishqbaaz: Indian TV Serial That talks About Issues

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मैं जब कहती हूं कि मुझे टीवी सीरियल देखना अच्छा लगता है तो अक्सर लोग ‘जजमेंट’ भरी नज़र से मुझे देखते हैं. कुछ लोग ‘बिग बॉस’ के ताने भी मारते हैं. हालांकि मुझे आज तक समझ नहीं आया कि लोग ‘बिग बॉस’ देखने वालों को जज क्यों करते हैं. खैर….

बड़े लोग कहते हैं कि हर उंगली एक बराबर नहीं होती, वैसे ही हर शो एक जैसा नहीं होता है. तो जिस टीवी इंडस्ट्री में ‘नागिन’, ‘ससुराल सिमर का’ जैसे शो हैं उसी इंडस्ट्री में ‘इश्कबाज’ जैसा शो भी को-एग्जिस्ट करता है. इस शो का मैंने लगभग हर एपिसोड देखा है. पिछले दो सालों से चल रहे इस शो की कहानी में कई मोड़ आए.

तीन भाईयों, उनकी आपसी बॉन्डिंग और उनकी लव स्टोरीज पर आधारित इस शो में भी सास-बहू का ड्रामा चला, प्लानिंग-प्लॉटिंग के सीक्वेंस दिखाए गए. लेकिन हाल कि दिनों में टीवी के ट्रेंड्स को छोड़ते हुए शो में उन मुद्दों को उठाया जा रहा है जो समाज से जुड़े हैं. शो का नया कलेवर दर्शकों को खूब भा रहा है. ट्विटर, इंस्टाग्राम पर वे शो को लेकर अपने व्यूज भी काफी शेयर करते हैं.

पिछले कुछ हफ्तों में सोशल मीडिया की लिमिट, बुजुर्ग मां-बाप का सम्मान, शिक्षा व्यवस्था, अंधविश्वास, शादी और बच्चों को लेकर समाज का प्रेशर, चर्चित #metoo कैम्पेन से जुड़े मुद्दों पर इस शो में बहस हो चुकी है. फिलहाल इसमें ऑनर किलिंग पर आधारित ट्रैक चल रहा है.

आज जब ज्यादातर टीवी शो आदर्श बहू के मानदंड स्थापित कर रहे हैं, जब कुछ शो दो लोगों की मोहब्बत को मजबूत दिखाने के लिए एक ही ट्रैक बार-बार चला रहे हैं तो वहीं टीवी स्क्रीन पर ‘इश्कबाज़’ के एक्टर्स इस बात पर बहस करते दिख रहे हैं कि सोशल मीडिया की हद क्या है. वे बहस करते हैं कि विश्वास और अंधविश्वास के बीच एक महीन रेखा है जिसे पहचानना बहुत जरूरी है.

जब लीड करेक्टर शिवाय सिंह ओबेरॉय कहता है कि फैमिली बिज़नेस को आगे बढ़ाने के प्रेशर में उसने डॉक्टर बनने का अपना सपना छोड़ दिया, जब वह कहता है कि ‘उम्र हो गई है’ के सोशल प्रेशर में उसे शादी के लिए सोचने पर मजबूर होना पड़ा तो लाखों ऑडिएंस को लगता है जैसे वह उनके मन की बात कर रहा हो. यह मैं नहीं कह रही, इंस्टाग्राम पर शो देखने वालों के कमेंट्स कुछ ऐसे ही हैं.

देश के सबसे रईस ओबेरॉय परिवार की दो बहुओं (जो असल में बचपन की बिछड़ी बहनें भी हैं) की परवरिश गरीबी और ग्रामीण परिवेश में हुई. एक पांचवी तो दूसरी 10वीं तक ही पढ़ सकी. ऐसे में यह शो अंग्रेजी नहीं आने की उन दोनों की हीनभावना को दिखाते हुए उन बड़े पब्लिक और कान्वेंट स्कूलों पर सवाल खड़े करता है जहां गार्डियन को अंग्रेजी नहीं आने पर बच्चे की एडमिशन रद्द कर दी जाती है. शो के किरदार बहस करते हैं कि सिर्फ अंग्रेजी आने से कैसे कोई व्यक्ति अधिक जानकार हो सकता है.

पिछले दिनों दिखाए गए #metoo कैम्पेन पर आधारित एपिसोड्स में भी इस बात पर फोकस किया गया कि जब एक महिला यौन शोषण का शिकार होती है, जब उसके साथ छेड़छाड़ होती है तो गलत वो नहीं होती. गलत वो होता जो उसके साथ ये हरकत करता है. एक लड़की को समाज का डर दिखाकर चुप कराने की कोशिश की जाती है और कई मामलों में परिवार वाले भी चुप हो जाना ही बेहतर समझते हैं और इसी का फायदा मोलेस्टर्स उठाते हैं. उन्हें लगता है कि कोई उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकता. शो के किरदार बहस करते हैं कि बेटियों को उनके कपड़ों, घर लौटने के वक्त पर लेक्चर देने की बजाए बेटों को ये सिखाने की जरूरत है कि लड़कियों का सम्मान करें.

हालांकि, इस सीक्वेंस में कई बार ‘औरत की इज्जत’ शब्द का इस्तेमाल किया गया जिससे मैं सहमत नहीं हूं. एक औरत के साथ रेप या यौन शोषण होने का मतलब यह नहीं है कि उसकी इज्जत चली गई.

क्यों जरूरी है ऐसे मुद्दों का टीवी शोज में उठना?
आज के समय में हर घर में कम से कम एक टीवी जरूर होता है, ये टीवी सीरियल्स अब ऐप्स के जरिए बस एक क्लिक पर हमारे फोन्स में उपलब्ध हैं. कोई भी मैसेज देने या विज्ञापन के लिए टीवी को एक सशक्त माध्यम माना जाता है. वैसे तो अखबारों, ब्लॉग्स और पता नहीं किन-किन माध्यमों से लोगों को बताने की कोशिश की जाती है कि क्या गलत है क्या सही है. लेकिन फिर भी लोग ढोंगी बाबाओं के जाल में फंसते हैं और महिलाओं-बच्चियों के साथ रेप-छेड़छाड़ की घटनाएं रोज सुनने को मिलती है. ऐसे में जब एक पॉपुलर शो में इन मुद्दों पर बहस होती है तो एक बड़े ऑडिएंस तक मैसेज पहुंचने की संभावना बढ़ जाती है.

वैसे भी इतने सालों से टीवी सीरियल्स के जरिए एक खास तबके या ग्रुप की रिग्रेसिव सोच को समाज पर थोपने की कोशिश की गई है. बीच में कुछ शो ऐसे भी आए जिनमें रेप पीड़िता की शादी उसके रेपिस्ट से ही करवा दी गई ताकि उस लड़की को समाज में जगह मिल सके. वैसे ही तुलसी, पार्वती और बाद में आई दूसरी बहुओं के जरिए टीवी सीरियल्स ने आदर्श बहू का एक खाका खींच दिया. फिल्मों और शो के जरिए क्रिएटिव फ्रीडम के नाम पर लंबे समय से हमारी सोच को मैनिपुलेट करने की कोशिश जारी है. और उन्हें सफलता भी मिली है ऐसे में अब ये इनकी नैतिक जिम्मेदारी भी बनती है.

और क्या खास है इश्कबाज में?
इस शो की सबसे बड़ी खासियत है कि समय के साथ इस शो के किरदार इवॉल्व हुए हैं या यूं कहें कि उन्होंने ग्रो किया है. जैसे शुरुआत में शिवाय के लिए नाम, खानदान,खून ही सबकुछ था. वह लोगों को उनकी फैमिली बैकग्राउंड से जज करता था लेकिन अब वह अधिक मैच्योर हो चुका है. वह अब लोगों को उनके नाम से नहीं उनके व्यक्तित्व से आंकता है. शुरुआत में शिवाय को लगता था कि घर चलाना औरत का काम है, उसकी बीवी चाहेगी तो वह उसे काम करने की ‘परमिशन’ दे देगा. लेकिन अब वह बराबरी का हिमायती बन चुका है. उसी तरह ओमकारा जो कभी जिंदगी को सिर्फ ब्लैक एंड व्हाइट, सच या झूठ के तराजू से तौलता था वह अब ग्रे शेड्स को भी समझने लगा है. इसी तरह शिवाय की मां में हमें एक आम भारतीय मां की छवि दिखती है जिसकी जिंदगी अपने बच्चे के इर्द-गिर्द ही घूमती है. बेटे की शादी के बाद मां की इनसिक्योरिटी और उसकी सोच में आने वाले बदलाव को भी इसमें बखूबी दिखाया गया है.

ऐसा नहीं है कि शो में सबकुछ बहुत अच्छा है, यह शो भी कई मायनों में असलियत से काफी दूर है. हर शो की तरह इसमें भी चीजें बढ़ा-चढ़ाकर दिखाई जाती हैं. मसलन शिवाय और अनिका (लीड पेयर) डेथबेड पर भी क्यों न हों एक दूसरे के आंसू की बूंद गिरते ही ठीक हो जाते हैं, शिवाय का हर चीज में एकदम परफेक्ट होना. शुरुआती कई सीक्वेंस ऐसे भी रहे जिन्हें देखकर लगा कि कुछ भी दिखा रहे हैं. और भी कई चीज़ें हैं…

पर कहते हैं न देर आए दुरुस्त आए, मुझे उम्मीद है कि बदले की कहानी, सास बहू ड्रामे पर लौटने की बजाए यह शो नए मुद्दे उठाता रहेगा. इन मुद्दों के साथ-साथ शो के किरदारों की प्यार भरी नोंक-झोंक का डोज़ भी दर्शकों को मिलता रहेगा…

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