हिंदी न्यूज़ – बेऔलाद दोस्त के लिए डोनेट किया स्पर्म, दर्दनाक था बच्चे से अलगाव/human story of a man in Delhi who donated sperm for his friend

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मुकेश (परिवर्तित नाम) मध्य प्रदेश के जबलपुर से हैं. बीते 2 साल से वह स्पर्म डोनेट कर रहे हैं. Hindi.news18.com के साथ उन्होंने अपने अनुभव साझा किए हैं.

मार्च 2015 की उस दोपहर मैं अपने शादीशुदा दोस्त के घर खाने पर आमंत्रित था. इस दौरान दोस्त ने एकाएक मुझसे अपना परिवार बढ़ाने में मदद मांगी. ‘किसी अनजान शख्स की बजाए क्यों न तुम हमारे लिए स्पर्म डोनर बनो!’ दोस्त की पत्नी अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से लगातार मुझे देख रही थी.

मां बनने की कोशिश में सालों तक दवाएं खाते हुए वो खुद किसी दवा की डिबिया जैसी बेजान लगने लगी थी. मुझसे कुछ कहते नहीं बना. सोचकर बताने का वादा कर लौट आया.

काम की तलाश में दिल्ली आया तब यही दोस्त मेरा परिवार बना. वह मेरे शहर से था. मेरी ज़ुबान बोलता. मुझसा खाता-पीता. मेरा हर वीकेंड उनके घर बीतता. दोस्त की पत्नी बड़ी बहन जैसे दुलारती. क्या मुझे अपनेपन का कर्ज चुकाने को कहा गया! मन में अजीब-से ख़याल आते. मैंने वहां जाना कम कर दिया. हालांकि ‘स्पर्महुड’ हर वक्त जहन में रहता. मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव (एमआर) हूं. जानता था स्पर्म देना खून देने से कहीं ज्यादा आसान है. फिर भी कुछ था, जो अटक रहा था. शायद मेरा कस्बाई मन या फिर शहर में जमने की जद्दोजहद.

वक्त के साथ दोस्त सैटल हो रहे थे. नौकरी. भरा-पूरा परिवार. समंदर घूमते तो फेसबुक पर तस्वीरें डालते. बर्फ देखते तो खूबसूरत कैप्शन लिखते. इधर मैं था. ग्रेजुएशन के बाद सरकारी नौकरी खोजने की कोशिश में नाकामयाब रहा. दिल्ली आया. बतौर एमआर मार्केटिंग करता था. बाइक से शहर नापते हुए चेहरा धूप और धूल से सन जाता. लौटते हुए पास के ढाबे में खाना खाकर सो रहता. खिड़कियों पर सिटकनी नहीं. दीवारें बदरंग. पानी कभी आता, कभी नहीं. मां बीते साल नहीं रही. पिता को फोन करता तो शिकायतों का अंबार सकेलता रहता.

पिता! पिता बनना क्या जिंदगी को बदल सकेगा! इतवार की दोपहर मैंने खुद को उसी परिचित दरवाजे के बाहर खड़ा पाया.

खून कई दफे दिया है. स्पर्म पहली बार देने पहुंचा.

नाम, पहचान गुप्त रखने के वादे के साथ शुरुआत हुई. कलेक्शन के लिए एक कंटेनर और कुछ किताबों के साथ एक कमरे में बिठा दिया गया. दरवाजा अंदर से बंद करने की इजाजत थी. किताबें एक ओर सरका मैंने मोबाइल खंगाला. कोई भी फिल्म अहसास नहीं जगा रही थी. मानो कोई इम्तिहान देने बैठा हूं. ‘इजैकुलेट’ करने में वक्त लगा. बाहर आया तो जैसे सब मुझे ही देख रहे हों. मैंने सैंपल थमाया और तेजी से निकल आया.

इंतजार भारी था. मानो मेरे पुरुषत्व का इम्तिहान हो.
‘हम किसी का भी स्पर्म नहीं ले सकते. एक पूरा-पूरा इंसान जन्म लेता है. बड़ी जिम्मेदारी का काम है. डोनर की डिटेल्स ली जाती हैं. ब्लड टेस्ट होता है. स्पर्म काउंट टेस्ट होता है. हर एक मिलीलीटर पर 60 मिलियन स्पर्म काउंट होना ही चाहिए. इससे कम वाले सैंपल रिजेक्ट कर देते हैं’,

ओखला में क्रायो स्पर्म बैंक के इंचार्ज सरत कुमार बताते हैं, ‘स्पर्म क्वालिटी के अलावा भी कई बातें होती हैं. जैसे क्लाइंट्स डोनर की जाति-धर्म जानना चाहते हैं. हम ये डिसक्लोज नहीं करते. बहुत से लोग डिमांड करते हैं कि डोनर ऊंचा-पूरा हो. गोरा रंग हो. इन जरूरतों का ध्यान रखना होता है. हर स्पर्म बैंक डोनर्स की प्रोफाइल रखता है ताकि क्लाइंट की जरूरत के अनुसार स्पर्म दिया जा सके.’

स्पर्म डोनेशन अपने परिचित के लिए भी किया जा सकता है, लेकिन अमूमन पहचान गुप्त रखी जाती है. डोनर से फॉर्म पर दस्तखत लिए जाते हैं, ताकि वो किसी भी हाल में बच्चे पर दावा न कर सके.

क्वालिफिकेशन, रंग, कद और उम्र के हिसाब से ‘पे’ करते हैं. एक डोनेशन पर 500 रुपए से लेकर कई बार कई हजार तक दिए जाते हैं.

डोनर जितना पढ़ा-लिखा होगा, उसे उतने ही पैसे मिलेंगे, सरत आगे जोड़ते हैं.

अस्पताल से बुलावा आया. ब्लड टेस्ट के बाद प्रक्रिया शुरू कर दी गई.
मैंने खुद को दोबारा इंतजार करता पाया. सिर झटककर याद दिलाता- मैं सिर्फ डोनर हूं.

‘भाभी’ का मिसकैरेज हो गया. दिनों तक मैं तकलीफ में रहा. सामने पड़ने पर चेहरा सपाट रखना होता. मुझे मेरे ही बच्चे का ‘सोग’ मनाने की छूट नहीं थी. प्रक्रिया दोहराई गई. वे दोनों दिन गिनते. उनके इंतजार में वैसे तो मैं भी शामिल था लेकिन एक दोस्त की हैसियत से.

इंटरनेट की दुनिया और अस्पताल में स्पर्म देना जितना आसान बताया गया था, दरअसल वैसा था नहीं.

एकाएक मैं खुद को जिम्मेदार महसूस करने लगा. उस अनदेखे बच्चे से जुड़ने लगा था. वो मेरा बच्चा होगा जो कभी नहीं जान पाएगा कि उसका पिता कौन है. वो मेरा पहला बच्चा होगा.

बढ़ते महीनों के साथ-साथ मेरी बेचैनी भी बढ़ने लगी. वीकेंड से पहली रात इंटरनेट पर बीतती. कनखियों से पेट देखता और बढ़ती प्रेगनेंसी को समझने की कोशिश करता. मैं अपने बच्चे की ग्रोथ के बारे में जानना चाहता था. दोनों अल्ट्रासाउंड के लिए जाते तो एकदम असहाय हो जाता. मैं शामिल होना चाहता था. वो मेरा बच्चा था. भले ही उसपर मेरा कानूनी हक नहीं.

एक शाम दोस्त का फोन आया. वो अपनी पत्नी को लेकर उसके मायके जा रहा था. पहला ‘जापा’ वहीं होता है- कहते हुए वो सहज था.

उनकी खुशी जितनी जाहिर थी, मेरी तकलीफ उतनी ही निजी. अगले कई दिनों तक उखड़ा रहा. यहां तक कि एक रोज खुद को काउंसलर के पास पाया.

जिंदगी पटरी पर लौटने लगी. एक रोज फोन आता है. मैं मार्केटिंग के सिलसिले में कहीं जा रहा हूं. साइड में रोककर बात करता हूं. दोस्त खुशी से लगभग चीख रहा है. मैं बच्चे का वजन पूछता हूं. भाभी की खैरियत पूछता हूं और फोन रख देता हूं.

इस वक़्त किया जाने वाला निहायत मासूम सवाल, ‘वो किसकी तरह दिखता है’, गले में जैसे अटककर रह जाता है. 

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