हिंदी न्यूज़ – फिल्ममेकर विवेक अग्निहोत्री किताब अर्बन नक्सल | filmmaker vivek agnihotri on urban naxals

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Himani Diwan

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Updated: June 14, 2018, 6:59 PM IST

पुलिस को एक चिट्ठी मिलती है. चिट्ठी में प्रधानमंत्री को मारने की साजिश का खुलासा होता है. इस चिट्ठी और साजिश के खुलासे के बाद एक नया शब्द सामने आता है अर्बन नक्सल. एक आम आदमी के नजरिये में इन तीनों बातों में से किसी भी बात को पूरी तरह समझना पेचीदा हो सकता है, मगर फिल्ममेकर विवेक अग्निहोत्री इस पेचीदगी पर पिछले कई सालों से रिसर्च कर रहे हैं. नतीजे में न सिर्फ ‘अर्बन नक्सल’ नाम की एक पूरी टर्म सामने आती है, बल्कि इस मुद्दे पर इसी नाम से उन्होंने किताब भी लिखी है. इससे पहले वह बुद्धा इन ए ट्रैफिक जाम जैसी फिल्म भी बना चुके हैं.

आखिर इस सबकी जरूरत क्यों पड़ी? 
इस मुद्दे पर विवेक कहते हैं, ‘ नक्सल शब्द सुनकर आप इसे सुदूर गांवों और जंगलों की बात समझ लेते हैं. आपको लगता है ये आदिवासी लोगों से जुड़ी कोई समस्या है, इससे हमें क्या फर्क पड़ता है. मगर ऐसा है नहीं. बीते कई सालों से ये हमारे देश में हो रहा है और ये मसला सिर्फ जंगलों का नहीं है, इसके मास्टरमाइंड शहरों में ही हैं, जो मेरी नजर में अर्बन नक्सल हैं. इंटरनेशनल टेरर ऑर्गेनाइजेशन से इन लोगों को फंडिंग मिलती है. इसी सोर्स से ये हथियार इकट्ठे करते हैं. ये एक रणनीति के तहत काम करते हैं. ये हमारे सिस्टम में अपने लोगों को भेज देते हैं. ये सब इस तरह होता है कि हमें पता भी नहीं चलता.’

कैसे की जा सकती है अर्बन नक्सल की पहचान

इस सवाल के जवाब में विवेक कहते हैं, ‘मैं इस मुद्दे पर कई सालों से काम कर रहा हूं, तो मुझे इसके बारे में काफी कुछ मालूम है. मुझे उन लोगों के नाम तक मालूम है. मगर आपको इनकी पहचान करने के लिए ये सोचना होगा कि क्या कारण कि कुछ लोगों को कभी भारत में कोई अच्छी चीज नहीं दिखती. सिर्फ भारत को गाली देना उसकी आलोचना करना ही क्यों उनका काम बन जाता है.

Vivek Agnihotri

विवेक अग्निहोत्री

आप सोचिए भारत जैसे गरीब देश में एक जर्नलिस्ट एक वकील एक डॉक्टर के पास कितनी संपत्ति होनी चाहिए. आप कहेंगे कुछ लाख, लेकिन इन लोगों के पास पांच-छह सौ करोड़ की संपत्ति होती है. ये संपत्ति कहां से आई है. ये सवाल कोई उठाता नहीं है. हमने इन सब चीजों को करप्शन से जोड़ लिया है. हर चीज करप्शन नहीं है. ये एक टेरेरिज्म चल रहा है.

भारत की सफलता के विरोधी हैं अर्बन नक्सल

विवेक इस पूरे मसले को इस तरह समझाते हैं, ‘ प्रधानमंत्री की आलोचना करना लोकतांत्रिक तरीके से एक अच्छी चीज है, लेकिन प्रधानमंत्री को मारने की धमकी देना या मारना गलत है. दलितों के उत्थान की बात करना बहुत अच्छी बात है, लेकिन इसके लिए सार्वजनिक प्रोपर्टी को जलाना बहुत गलत है. कुछ गलत लग रहा है, तो वो बोलो, लेकिन अगर उस पर मार-पिटाई शुरू कर दोगे, तो वो गलत है. हिंसा करना किसी भी तरीके से गलत है. ये लोग हिंसक हैं. बहुत सारे लोग इनकी पूरी स्ट्रेटेजी को समझे बिना ही इसमें शामिल हो जाते हैं.

मैं सिर्फ बीजेपी के लिए काम नहीं कर रहा हूं

मैं सिर्फ बीजेपी के लिए नहीं, किसी भी सरकार के साथ देश के लिए इस काम को करता ही रहूंगा. कई साल से मैं अर्बन नक्सल के मुद्दे पर काम कर रहा हूं, लेकिन तब कोई मानता नहीं था. अब किताब आई है, तो लोगों को भी समझ में आने लगा है कि ये मुद्दा कितना गंभीर है. इसका एक ही तरीका है कि हमें सवाल पूछना शुरू करना होगा. हमें नफरत और नकारात्मकता फैलाने वालों को जवाब देना होगा. ये लोग चाहते नहीं हैं कि आज का युवा देश को आगे ले जाए या इसके लिए काम करे, क्योंकि ऐसा हो जाएगा, तो भारत दुनिया की तमाम इस्लामिक ताकतों पर प्रभुत्व जमाने लगेगा. हमने सवाल उठाए हैं, उसके बाद इस तरह के लोगों की गिरफ्तारियां भी हुई हैं. अभी कई और लोग फंसने वाले हैं.

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