हिंदी न्यूज़ – पागल मानकर पेरेंट्स ने छोड़ दिया, अनाथाश्रम से उसे घर लाने के लिए मैंने लंबी लड़ाई लड़ी/meet India’s youngest single father Aditya Tiwari

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उससे पहले मैं कभी अनाथालय नहीं गया था. संयोग ही रहा होगा कि पापा के जन्मदिन पर पुणे से इंदौर पहुंचा और उससे मिला. उस अनाथालय में एक के बाद एक सारे बच्चे अडॉप्ट किए जा रहे थे, सिवाय अवनीश के. वो स्पेशल बच्चा था, उसके दिल में दो छेद थे, उसके घुटनों में दिक्कत थी. पेट हमेशा खराब रहता. ऐसे बच्चे को भला कौन लेना चाहेगा! मैं लौट तो आया लेकिन दिनों तक वही चेहरा याद आता रहा. महीनेभर मैं दोबारा पुणे से इंदौर पहुंचा ताकि उससे मिल सकूं. अब मैं उसे गोद लेना चाहता था.

शुरू में सबने मेरी बात को मजाक में लिया. जब मैंने इस ओर कोशिशें शुरू कीं तो मुझे डराने लगे. किसी ने कहा, ऐसा बच्चा लेने से जिंदगी बर्बाद हो जाएगी. किसी ने कहा, मेरी नौकरी चली जाएगी. किसी ने कहा, मर्द बच्चे नहीं पाल सकते. कईयों ने डराया कि कोई लड़की मुझसे शादी नहीं करेगी. मैं सब सुनता.

रात बैठकर अलग-अलग विभागों को ई-मेल करता कि मुझे वो बच्चा गोद लेने दिया जाए. लगभग हर वीकेंड हजार किलोमीटर ड्राइव करता ताकि उससे मिल सकूं. अनाथालय के लोगों के सिखाने पर वो मुझे पापा बोलना शुरू कर चुका था. आखिरकार 1 अगस्त 2015 को अडॉप्शन लॉ में बदलाव हुए और जनवरी 2016 में अवनीश मेरे साथ था.उसे गोद लेने में डेढ़ साल लगे. इस वक्त ने मुझे पूरी तरह से तैयार कर दिया था. मैंने डाउन सिंड्रोम के बारे में खूब पढ़ा. बच्चे को संभालने, डायपर बदलने, फॉर्मूला बनाने पर मेरी तैयारी किसी मां से कम नहीं थी. अवनीश घर आया. तब मैं पुणे में था. अपने पोते के साथ रहने के लिए मेरे पेरेंट्स भी आ चुके थे. शुरुआत में कई रातें मैंने जागकर बिताईं. अवनीश मेरे शरीर का हिस्सा न सही, मेरे दिल का हिस्सा बन चुका था. वो बीमार पड़ता तो मैं छुट्टी लेकर उसके साथ रहता. मांओं की साइट्स गूगल करता, बच्चों की दिक्कतें समझता.

जब मैं उसे लेकर आया, तब वो बार-बार बीमार पड़ता. डॉक्टरों ने कहा था कि दिल में छेद के कारण उसे तुरंत सर्जरी की जरूरत है. प्यार और देखभाल ने सब बदल दिया. अवनीश एकदम सेहतमंद हो गया. अब वो नॉर्मल बच्चों के स्कूल जाता है. इतना प्यारा है कि उसे छोटी क्लास, बड़ी क्लास के बच्चे, टीचर, हाउस कीपिंग स्टाफ तमाम स्कूल जानता है. बड़े-बड़े शब्दों की कमी को उसकी मासूमियत भर देती है.

एक रोज एकाएक मुझे समझ आया कि उसे जानवर बहुत पसंद है, खासकर शेर. इंदौर के चिड़ियाघर में मैंने एक बंगाल टाइगर को अडॉप्ट किया. उसके खाने-इलाज का खर्च हम उठाते हैं. जब भी इंदौर जाते हैं, चिड़ियाघर जाते हैं. अवनीश से उसे शेर की मुलाकात बड़ी मजेदार होती है. शेर सोता रहता है, मूड में होता है तो बाहर निकलकर दहाड़ता है. अवनीश उसे ‘हप’ करता है. कई बार गले लगाने की जिद पकड़ लेता है. स्पेशल बच्चा है इसलिए किसी से नहीं डरता, सबको प्यार देता है.

उसके साथ होता हूं तो कई बार वो मेरी मां बन जाता है. दफ्तर से आता हूं तो मेरा बैग जगह पर रख देता है. उदास होता हूं तो मुझे दुलारता है. संडे को अक्सर मुझसे पहले जाग जाता है और पालथी लगाकर मेरे पास ही बैठा रहता है, जब तक मैं न जाग जाऊं. घंटों मेरा माथा, मेरी आंखें, नाक छूता रहता है. मैं नाचूं तो मेरे साथ नाचने लगता है. मैं चुप रहूं तो वो भी एकदम गुमसुम हो मुझसे सटकर बैठा रहता है.

अवनीश को मेरी जरूरत नहीं, मुझे उसकी जरूरत है. उसकी हंसी मेरे दिनभर की थकान का मेहनताना है.

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