हिंदी न्यूज़ – पहले उनके फोन का इंतजार रहता था, अब उनकी लाश का /Indians killed in Iraq’s Mosul Interview with family members

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इराक के मोसुल में 2014 में लापता 39 भारतीयों की मौत की पुष्टि हुई है. इन्हीं में से एक थे जालंधर के चुरोवाली गांव के सुरजीत कुमार. वे वहां मजदूरी के लिए गए थे. hindi.news18.com से उनकी पत्नी उषा रानी की बातचीत…

जब वो कमाने के लिए इराक गया तो हर पांचवें रोज फोन करता. थोड़ी देर ही बात हो पाती. मैं जल्दी-जल्दी सब हालचाल बताती, यहां तक कि भूरी गाय का बछड़ा हुआ है, जैसी बातें भी. बस, कभी ये नहीं बता पाई कि मुझे तुम्हारी बहुत याद आती है, कभी ये नहीं कह पाई कि बस, अब वापस आ जाओ. अब उसकी लाश का इंतजार कर रही हूं ताकि कम से कम उसे ही जी-भरकर देख पाऊं.

साल 2008 में हमारी शादी हुई. तब मैं 25 की थी और सुरजीत मुझसे एकाध साल बड़ा. शुरुआत में ससुराल में सबकुछ नया-नया लगता. मां-बाप के घर पर काम किया था लेकिन यहां हर बात पर अटक जाती. ऐसे में सासू मां के साथ वो भी मदद करता. समझाता कि ये घर भी मेरा उतना ही अपना है. मैं धीरे-धीरे रम गई.

काम के लिए वो एक शहर से दूसरे शहर भटकता रहता. कारपेंटरी भी करता और ड्राइवरी भी. शादी के बाद हम ज्यादा साथ नहीं रह पाए. जब वो कई-कई महीनों बाद घर लौटता तो हम घर के काम, खेती-बाड़ी जैसे कामों में उलझ जाते. इसी बीच हमारा एक बेटा हुआ और मेरे पास भी वक्त कम रहने लगा.उस वक्त में प्यार था, परवाह थी, लेकिन पैसों की भारी तंगी थी. तभी सुना कि शहर का कोई बंदा काम करने वालों को इराक ले जा रहा है. सुरजीत ने भी उससे बात की. उसे बताया कि वो क्या-क्या काम जानता है. बिचौलिया उसे दूसरे देश भेजने को तैयार था लेकिन इसके लिए उसने लगभग ढाई लाख मांगे. हमारे पास पैसे तो थे नहीं, सुरजीत ने कर्ज लिया. सोचा कि वहां जाकर ज्यादा पैसे आएंगे तो जल्दी ही कर्ज चुकता कर देंगे. जाते तक मेरा दिल तैयार नहीं था. तैयारी करते हुए बार-बार आंखें भर आतीं, फिर शगुन-अपशगुन की सोचकर आंसू पोंछ लेती.

ये दिसंबर 2013 की बात है. वो गया. हर पांचवें दिन फोन आता. हमारा फोन लगता नहीं था. सूट-बूट में अपनी फोटो भेजी तो लगा कि सब ठीक चल रहा है. वो फोन पर घर का, रिश्तेदारियों का हालचाल लेते. फिर अचानक उसका फोन नहीं आया. दिनों तक हमने इंतजार किया. जिस नंबर से फोन आता, वो भी नहीं लग रहा था. तभी टीवी और पत्रकारों से पता चला कि वो और दूसरे कई साथी गायब हो गए हैं.

तब हमारे घर लगातार पत्रकार, पुलिस, नेता आते रहते. हम खुद को संभालें या उनके सवालों का जबाव दें. जैसे-तैसे बात करना शुरू किया. तब उम्मीद थी कि वो है. मैं रोज फोन का इंतजार करती. पहले मोबाइल यहां-वहां छोड़कर घर के कामों में जुटी रहती लेकिन उसके लापता होने के बाद से मोबाइल मेरे साथ हर वक्त रहने लगा. रसोई में काम करते, सिलाई करते, बच्चे को संभालते, मैं फोन साथ रखती. कोई कॉल नहीं आया, न पहले दिन, न पांचवें दिन, न पहले महीने, न पांचवे महीने. चार बरस बीत गए. बेटा बार-बार याद करता.

पंजाब सरकार की ओर से हर महीने गुजारा भत्ता मिलता लेकिन पिछले साल जून से वो भी नहीं मिला. मैं सिलाई करने लगी और सासू मां गाय-भैंस का दूध बेचतीं. वहां जाने के लिए जो लोन लिया था, उसका ब्याज बढ़ रहा था. चुकता करने के लिए पुश्तैनी घर का आधा हिस्सा बेच दिया. पैर सिकोड़कर जीने लगे. जो भी था, जिंदगी में उम्मीद थी कि एक दिन वो शख्स लौट आएगा, जिसके नाम पर जिंदगी बिता रही हूं. हर त्यौहार पर सुहागिनों की तरह सजती, करवाचौथ पर तस्वीर देख पानी पीती. दुआ करती कि वो जहां भी रहे, सलामत रहे और जल्दी लौट आए.

छह दिनों पहले टीवी पर खबर चली कि इराक के मोसुल में लापता 39 भारतीय मारे गए. एक पहाड़ी के नीचे कई लाशें मिलीं. घर पर, टीवी वाले, अखबार वाले, पुलिस वाले सब आ गए. वे सवाल पर सवाल कर रहे थे और मैं सोच रही थी कि मेरा इंतजार खत्म हुआ. अब मैं किसी फोन का इंतजार नहीं करूंगी. कोई याद मुझे वैसे बेचैन नहीं करेगी. अब कोई मुझे छेड़ेगा नहीं, हंसाएगा नहीं, रुलाएगा नहीं. अब कोई त्यौहार वैसा नहीं होगा…लेकिन कुछ इंतजार अब भी बाकी है.

मैं सरकार से कुछ नहीं चाहती. मुझे सिर्फ अपने पति की लाश वापस चाहिए. मैं उन्हें देखना चाहती हूं, पहली और आखिरी बार बताना चाहती हूं कि तुमसे प्यारा मुझे कोई नहीं. उसे बताना चाहती हूं कि मैंने तुम्हारा कितना इंतजार किया. उसपर गुस्सा करूंगी कि वो कितना कम वक्त साथ रहा. उसकी दोस्तीबाजी पर गुस्सा होना चाहती हूं. वो कभी घर पर टिकता ही नहीं था और मैं दिनभर उसके खड़के की बाट जोहती. ये सारे इंतजार खत्म हुए. अब उसकी बंद आंखों और रुके हुए दिल से अपने दिल और बीते दिनों का हाल कहना है.

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