‘मुस्लिमों में भी जाति और लिंग के आधार पर भेदभाव है’

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इंडियन एक्‍सप्रेस के ओपिनियन पेज पर हाल के दिनों में एक बड़ी बहस ने पूरे देश का ध्‍यान खींचा. 17 मार्च को सामाजिक कार्यकर्ता हर्ष मंदर के अल्‍पसंख्‍यकों की स्थिति पर लिखे गए आर्टिकल ‘Sonia, sadly’ से यह बहस शुरू हुई. इसका जवाब 20 मार्च को प्रसिद्ध इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने ‘Liberals, sadly’ आर्टिकल के माध्‍यम से दिया. उसके बाद से लोकतंत्र, बहुसंख्‍यकवाद और अल्‍पसंख्‍यकों की दशा-दिशा पर दोनों ही पक्षों की तरफ से एक राष्‍ट्रव्‍यापी बहस एक्‍सप्रेस के iDeas Series में देखने को मिली. इसको सीरीज को द मायनॉरिटी स्‍पेस (The Minority Space) नाम दिया गया. हर्ष मंदर ने मौजूदा दौर में सार्वजनिक-राजनीतिक  परिदृश्‍य में मुस्लिमों के हाशिए पर जाने और उनकी बढ़ती अदृश्‍यता के बारे में लिखा. इसके बरक्‍स गुहा ने अपने आर्टिकल में लिखा कि मुस्लिम राजनीतिक नेतृत्‍व का अभाव और सामाजिक सुधारों की कमी के कारण यह समाज हाशिए पर पहुंचा है. इन दोनों ही विचारों के पक्ष-विपक्ष में कई लेख लिखे गए. अब तक 18 लेख एक्‍सप्रेस में इस विषय पर छप चुके हैं. अभी भी यह बहस जारी है. इस बड़ी रोचक बहस में हम हर्ष मंदर और रामचंद्र गुहा के मूल आलेखों का सार यहां दो किश्‍तों की सीरीज में पेश कर रहे हैं. इसकी पहली कड़ी में हर्ष मंदर के आर्टिकल ‘Sonia, sadly’ की अहम बातों को प्रकाशित किया जा चुका है. अब दूसरी यानी आखिरी किस्‍त में रामचंद्र गुहा के ‘Liberals, sadly’ आर्टिकल के अंश यहां पेश किए जा रहे हैं: 

1. हर्ष मंदर ने एक दलित नेता का जिक्र करते हुए कहा है कि उन्‍होंने मुस्लिमों से कहा कि आप बड़ी संख्‍या में हमारी रैलियों में आइए लेकिन अपनी टोपी और बुर्का में मत आइए. हर्ष मुस्लिमों को दी जाने वाली इस सलाह से निराश हुए और इसे अल्‍पसंख्‍यक समुदाय से स्‍वेच्‍छा से राजनीति छोड़ने के आग्रह के रूप में देखते हैं. इसके बरक्‍स भले ही यह सुनने में तीखा लगे लेकिन इस सलाह के पीछे प्रगतिशील भावना को देखना चाहिए. मेरे जैसे तमाम लोग रैलियों में हिंदुओं के भगवा रंग और त्रिशूल दिखाने का विरोध करते हैं. इस आधार पर भले ही बुर्का कोई हथियार नहीं है लेकिन यह आस्‍था के प्रतिक्रियावादी पहलू को ही प्रतिबिंबित करता है.  सार्वजनिक जगहों पर इनके प्रदर्शन का विरोध करना असहनशीलता नहीं बल्कि उदारता और मुक्ति के प्रतीक के रूप में देखा जाना चाहिए.

2. मुस्लिम हमारे समाज में क्‍या योगदान दे सकते हैं? इस संदर्भ में उदाहरण देते हुए हर्ष मंदर ने कहा कि लंदनवासियों ने पाकिस्‍तानी मूल के लोकप्रिय मुस्लिम मेयर को चुना है. यहां यह स्‍पष्‍ट करना चाहिए कि मेयर सादिक खान टोपी नहीं पहनते हैं और उनकी पत्‍नी बुर्का धारण नहीं करतीं. इसका यह भी आशय नहीं कि बहुसंख्‍यक क्रिश्चियनों के दबाव में खुद को ब्रिटिश साबित करने के लिए वे ऐसा करते हैं. इसके बजाय वे खुद लैंगिक समानता और सांस्‍कृतिक विविधता के प्रतीक के रूप में दिखते हैं. ये आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्‍य उनके पहनावे से नहीं बल्कि उनकी इनके प्रति आस्‍था से प्रतिबिंबित होते हैं.

3. हर्ष मंदर यह भी कहते हैं कि मुस्लिमों को अपना नेता चुनने के लिए किसी की अनुमति की जरूरत नहीं है. इसी तर्क के आधार पर क्‍या वह प्रतिक्रियावादी मुस्लिम नेताओं की आलोचना करने का हक बाकियों को देंगे. हर भारतीय का यह कर्तव्‍य है कि वह संविधान के खिलाफ बात करने वाले नेताओं की आलोचना करे, भले ही चाहे वह किसी भी धर्म का हो. यदि कोई मुस्लिम या क्रिश्चियन साथी किसी पिछड़ी सोच रखने वाले हिंदू नेता की आलोचना करता है तो हिंदू होने के नेता उसका मैं कभी विरोध नहीं करूंगा. ठीक इसी तरह यदि मैं हिंदू होते हुए असदुद्दीन ओवैसी या सैयद अली शाह गिलानी का विरोध करता हूं तो मेरे इस सेक्‍युलर लोकतांत्रिक अधिकार का भी किसी को विरोध करने का हक नहीं होना चाहिए.

4. आजादी के बाद से हमारी समझ में तीन ऐसे मुस्लिम नेता हुए हैं जिन्‍होंने मुस्लिम समाज को आधुनिक जगत से परिचित कराने का प्रयास किया है. इनमें से एक शेख अब्‍दुल्‍ला थे…दूसरे हामिद दलवई थे जोकि अपने समय से काफी पहले जवानी में ही गुजर गए. तीसरे नेता आरिफ मोहम्‍मद खान हैं, जिनको उनके ही प्रधानमंत्री ने धोखा दिया. ये तीनों सेक्‍युलर आधुनिकतावादी हैं.

5. मैं भी हर्ष मंदर की तरह हिंदू बहुसंख्‍यकवाद का आलोचक हूं क्‍योंकि बहुसंख्‍यक होने के नाते हिंदुओं की सांप्रदायिकता, मुस्लिम सांप्रदायिकता से ज्‍यादा खतरनाक है…इसी के साथ यह समझने की जरूरत भी है कि मुस्लिमों में भी जाति और लिंग के आधार पर भेदभाव है. इस लिहाज से उदारवादियों को उनमें समानता और व्‍यक्तिगत स्‍वतंत्रता के मूल्‍यों के लिए सतत प्रयास करना चाहिए. उनको समुदाय के बजाय व्‍यक्ति के हितों को प्रोत्‍साहित करना चाहिए और ऐसी सार्वजनिक नीतियों के प्रति आग्रही होना चाहिए जो तार्किकता के आधार पर हो. इस मुहिम में उदारवादियों को हिंदू और मुस्लिम संप्रदायवादियों के खिलाफ संघर्ष करना चाहिए.

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